रक्त का कतरा-कतरा जुटे।

रक्त का  कतरा-कतरा जुटे जाये!
शालीनता भरे इस इमारत में ।
 मेहनत से उपजे
पसीने की खूश्बू भी शरीक होकर,
धूल- मिट्टी की चादर लपेट ले!
धूप-छांव की परवाह किये बगैर
मेरे राहों में बिछे कांटे भी
उमंग व हौसले के उङान से
वाह!लग रहें कितने प्यारे।
यह प्यास हैं कामयाबी की
जीत के उमंग के आगे 
रास्ते की कठिनाइयाँ भी 
पहाङों में मीठे जल-स्रोत सरीखे।
-डॉ॰ मनोज कुमार

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Dr Manoj Kumar brief profile

डॉ॰ मनोज कुमार, मनोवैज्ञानिक, पटना संक्षिप्त परिचय ।

जब तक पिता जी के छांव में थे!सच पूछिये हम जी रहे थे बङे बेफिक्र होकर।उनके कोमल स्पर्श से बन ऊर्जावान !सिर पर मिले आशीष से हर दुःख, मानो हो जाता था चित।वह थे तो दुनिया रंग-बिरंगी मानोइंद्रधनुषी रंग से नहायी !सपने देखा जब भी मैंने , अगले पल हौसला पिताजी ने बढाया।वह थे तो मानो मन की थी रोज दिवाली !रूखी -सूखी रोटियां भी स्वाद में निराली थी।जिनकी उंगली पकङ इठलाया था कभी!करोङो के दौलत भी मानो अब बेमानी।पिता हैं तो सब सुख है!हम सब प्राणियों का वजूद है।उनके बिना जीवन में क्या चैन!इस जीवन में माता-पिता हैं अनमोल।पिता को समझिए,वह दर्शन हैं !वह तो इस संसार में हमारे नींव निर्माता ।ईश्वर की तरह पिता को पूज लिए जिस संतान ने!जीवन के असल मायने पा लिए उस इंसान ने।🙏🙏-डॉ॰ मनोज कुमार